कवितामनोगतमनोरंजन कट्टासामाजिक कट्टा

बेवफा निकली तू..

सपने थे मेरे तेरे साथ

बेवफा निकली तू और चली गई दुसरों के साथ

मर गया मेरा सपनो का रास्ता तूझसे त्यार करके

दुनिया के हर कोने मे जाकर खूशी से जीना चाहता था तूझे साथ लेकर

अपने खूशी से दूर चला गया तेरे साथ रहकर

क्या पता था तू इतनी चालाक निकले गी की हाथ मे नही आयेंगी

मेंने खुदसे ज्यादा तूमसे म्यार किया

मेंने तूम्हारी खातीर अपनो के बीच रहना छोड दिया

मुझे लगा तू आझाद हे तेरा अलग अस्तित्व हे

लेकिन तू तो किसी और के दिमाग से चलती हे

तू तो पिंजरे में बंद हे

हर साल तू मुझे मिलने आऐगी

लेकिन तू तो बेवफा निकली कैसे आऐगी

क्या कमी हे हम में ये तो हमे बता दे

तेरे चक्कर में हमारे ५ -६साल युही निकल गये

कब तक तेरे पिछे हम चक्कर लगाएगें

तूझे बोलना हे तू बोल दे हम इस काबिल नही हे

तेरे खातिर हमे जो पसंद नही था वो भी हमने किया

हमे अपनों की पहचान ठिक से पता नही हे ले किन

तूम्हारे खातीर हमने सभी इंसान की जन्म कुंडली को भी याद किया

हमे दिन कब और रात कब होती हे ये नही पता चलता

बस तूम्हारे लिये युही चलते रहते हे

हमे अपनो का जन्म दिन याद नही हे लेकिन

देश विदेश मे हर दिन क्या क्या हुआ हे ये सब याद हे

हमसे खफा मत हुआ करो हमसे बाते किया करो

तूम्हारा साथ छोडना चाहा लेकिन दिल तूम्हे छोडने नही देता क्युंकी तूमसे इतने सालो का लगाव जो हे

तेरी आदत हो चूकी हे

हमने अपना चेहरा ठिक तरह से कुछ साल से नही देखा

तेरे लिए जो भी करना हे वो करते करते दिन गुजर जाता हे

तू साथ थी तो हिंमत आती थी

बेवफा निकली तू

लेकिन अब तेरे पास आने को भी अब डर लगता हे क्योंकि तू मिलने को भी कभी कभी आती हे

वक्त की और मेंने कभी ध्यान नही दिया

क्योकि मूझे लगा तू मेरा खयाल रेखेगी

हर साल तू आ जाती तो मे तूझे अपना लेता

तूटा हू तेरे साथ रहकर

गीर चूका हू तूझे गले लगाने के कारण

मुस्कारांना भूल गया हू तूझे याद करकर

जब तक तू मिलती थी

तो मूझमे विश्वास था में चाँद- तारो को भी तोंड कर ला सकता हू

तेरी खातीर पुरी जवांनी कितांबो के पन्नों को समजने मे गयी

फिर भी तू हात नही आयी

में वक्त के साथ नही चला

में तूझसे भरोसा करके अपने सपनों के साथ चला

अब में शुन्य हू

ना वक्त मेरे साथ हे

ना पैसा मेरे साथ हे

ना तू मेरे साथ हे

ना मेरा कल मेरे साथ हे

बस कुछ यांदे और ये कलम जो मेरा सुनता हे

और मेरा साथ देता हे.

लेखनकार : राम ढेकणे

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